भ्रष्टाचार : नगर पंचायत अध्यक्ष जितेंद्र चौहान के वित्तीय-प्रशासनिक अधिकार छीने, एडीएम पौड़ी को मिला प्रभार

पौड़ी गढ़वाल। उत्तराखंड की धामी सरकार ने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का बड़ा संदेश दिया है। पौड़ी जिले की सतपुली नगर पंचायत के अध्यक्ष जितेंद्र चौहान पर शासन ने बड़ा हंटर चलाया है। अनियमितताओं की जांच रिपोर्ट के आधार पर शासन ने अध्यक्ष के समस्त वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से सीज कर दिए हैं।

सचिव, शहरी विकास विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार अब सतपुली नगर पंचायत के सभी अधिकार अपर जिलाधिकारी (ADM) पौड़ी के पास रहेंगे। साथ ही अध्यक्ष को कारण बताओ नोटिस जारी कर 15 दिन में जवाब मांगा गया है कि क्यों न उन्हें पद से हटाया जाए।

RTI से उठा पर्दा
सामाजिक कार्यकर्ता रविंद्र रावत और शशांक घिल्डियाल ने जुलाई 2025 में RTI से नगर पंचायत के खर्चों की जानकारी निकाली। इसमें कई गड़बड़ियां दिखीं तो उन्होंने सीधे शासन में जांच की मांग की।

5 सदस्यीय जांच टीम
शासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए SDM सतपुली की अध्यक्षता में 5 अधिकारियों की जांच समिति बनाई।

सितंबर में रिपोर्ट
समिति ने सितंबर में अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट शासन को सौंपी, जिसमें अध्यक्ष के खिलाफ 3 बड़े आरोप सही पाए गए।

अपने ही पेट्रोल पंप से खेल
सबसे बड़ा आरोप ईंधन घोटाले का है। जांच में पाया गया कि नगर पंचायत के वाहनों और जनरेटरों के लिए ईंधन अध्यक्ष के निजी पेट्रोल पंप से ही नियम विरुद्ध तरीके से खरीदा जा रहा था, जिससे सीधे तौर पर पद का दुरुपयोग और निजी लाभ का मामला बनता है।

पार्किंग ध्वस्तीकरण में मनमानी

नगर की एक पार्किंग को बिना किसी तकनीकी समिति की राय और बिना टेंडर प्रक्रिया के ही ध्वस्त कर दिया गया, जिससे सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा।

निविदाओं का कृत्रिम विखंडन
बड़े कामों को जानबूझकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया गया ताकि ई-टेंडरिंग से बचा जा सके और अपने चहेते ठेकेदारों को काम दिया जा सके। यह वित्तीय नियमावली का सीधा उल्लंघन है।

अब आगे क्या?
अधिकार सीज होना पहली कार्रवाई है। यदि अध्यक्ष अपने कारण बताओ नोटिस का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाते हैं, तो शासन नगर पालिका अधिनियम के तहत उन्हें अध्यक्ष पद से बर्खास्त भी कर सकता है।

फिलहाल सतपुली में इस कार्रवाई के बाद हड़कंप मचा हुआ है। लोगों का कहना है कि छोटे से नगर पंचायत में भी अगर इतना खेल हो रहा है, तो बड़े निकायों का क्या हाल होगा

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